अनहोनी को होनी में बदल देता है अहोई अष्टमी व्रत

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आलेख-: आचार्य पंडित प्रकाश जोशी गठिया नैनीताल

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को यानी करवा चौथ व्रत के चार दिन बाद आता है यह पर्व। जिस प्रकार पति की दीर्घायु के लिए करवा चौथ व्रत रखा जाता है ठीक इसी प्रकार संतान की दीर्घायु एवं सुखमय जीवन की कामना इस व्रत में की जाती है।

शुभ मुहूर्त-:
इस बार दिनांक 13 अक्टूबर 2025 दिन सोमवार को दीपा अष्टमी (अहोई अष्टमी) पर्व मनाया जाएगा। इस दिन यदि अष्टमी तिथि की बात करें तो 15 घड़ी 22 पल अर्थात दोपहर 12:25 बजे से अष्टमी तिथि प्रारंभ होगी। इस दिन आद्रा नामक नक्षत्र दोपहर 12:27 बजे तक है। सबसे महत्वपूर्ण यदि पूजा के शुभ मुहूर्त की बात करें तो इस दिन सायं 5:53 बजे से सायं 7:08 बजे तक पूजा का शुभ मुहूर्त है।

अहोई अष्टमी व्रत कथा-:
अहोई अष्टमी व्रतके संबंध में कुछ कथाएं प्रचलित हैं। एक कथानुसार प्राचीन काल में किसी नगर में एक साहूकार रहता था। उसके सात लड़के थे। दीपावली से पहले साहूकार की स्त्री घर को लीपने हेतु मिट्टी (कमेट) लेने खदान (कमेट खांण) में गयी और कुदाल से मिट्टी (कमेट )खोदने लगी। दैव योग से उसी जगह एक सेह की मांद थी। सहसा उस स्त्री के हाथ से कुदाल सेह के बच्चे को लग गयी, जिससे सेह का बच्चा तत्काल मर गया। अपने हाथ से हुई हत्या को लेकर साहूकार की पत्नी को बहुत दुख हुआ परन्तु अब क्या हो सकता था। वह पश्चाताप करती हुई शोकाकुल अपने घर लौट आयी। कुछ दिनों बाद उसके बेटे का निधन हो गया। फिर अकस्मात दूसरा, तीसरा और इस प्रकार वर्ष भर में उसके सभी बेटे मर गये। महिला अत्यंत व्यथित रहने लगी। एक दिन उसने अपने आस-पड़ोस की महिलाओं को विलाप करते हुए बताया कि उसने जानबूझकर कभी कोई पाप नहीं किया। हां, एक बार खदान में मिट्टी खोदते हुए अनजाने में उससे एक सेह के बच्चे की हत्या अवश्य हुई है और तत्पश्चात मेरे सातों बेटों की मृत्यु हो गयी। यह सुनकर पास-पड़ोस की वृद्ध महिलाओं ने साहूकार की पत्नी को दिलासा देते हुए कहा कि यह बात बताकर तुमने जो पश्चाताप किया है, उससे तुम्हारा आधा पाप नष्ट हो गया है। तुम उसी अष्टमी को भगवती माता की शरण लेकर सेह और सेह के बच्चों का चित्र बनाकर उनकी आराधना करो और क्षमा-याचना करो। ईश्वर की कृपासे तुम्हारा पाप धुल जायगा। साहूकार की पत्नीने कार्तिक मास की कृष्णपक्ष की अष्टमी को उपवास एवं पूजा-याचना की। वह हर वर्ष नियमित रूप से ऐसा करने लगी। बाद में उसे सात पुत्र रत्नों की प्राप्ति हुई। तभी से अहोई व्रत की परम्परा प्रचलित हो गयी। देवी पार्वती को अनहोनी को होनी बनाने वाली देवी माना गया हैं, इसलिए अहोई अष्टमी पर माता पर्वती की पूजा की जाती है और संतान की दीर्घायु एवं सुखमय जीवनकी कामना की जाती है।

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