टाइफ़ून-मेरी आपबीती

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चीन के ग्वांग्झाउ प्रांत से जब हमारा थाई एयरलाइंस का TG 669 हवाई जहाज़ बैंकॉक के स्वर्णभूमि एयरपोर्ट के (बायोन इन्टरनेशनल एयर पोर्ट) लिए उड़ान भरने वाला था,तो हम लोग बहुत खुश थे कि आठ महीने बाद अपने घर नैनीताल वापस जा रहे हैं, लेकिन ये क्या सर मुड़ाते ही ओले पड़ गये ।सामान चैकइन कराते समय बर्तन धोने वाले सबीना पावडर को चरस समझकर उन्होंने हमारा एक सूटकेस खुलवा दिया । फिर तो एक एक कर हमें मुसीबतों का सामना करना पड़ा ।सिक्योरिटी चैक कराने के बाद हम जब बावन नम्बर गेट पर बैठ कर कॉफ़ी पीने लगे ,तो सुगबुगाहट सुनाई दी कि चीन में टाइफ़ून तूफ़ान के कारण फ़्लाइट लेट हो सकती है, किन्तु कितना लेट ये नहीं पता चला ।हमें बैठे बैठे तीन घंटे बीत गये किन्तु फ़्लाइट बोर्ड होने का नाम ही नहीं ले रही थी ।ऐसे में न तो कुछ पढ़ने का मन कर रहा था और न बात करने का ।तब बड़ी मुश्किल से फ़्लाइट बोर्ड हुई और हमने राहत की साँस ली ।स्मिता और हमारी सीट्स दूर बिलकुल अलग-अलग थीं ।लेकिन उस दिन इतनी मूसलाधार बारिश और टाइफ़ून तूफ़ान था कि हवाई जहाज़ उड़ाने की इजाज़त नहीं मिल रही थी । इस बीच हमने तो दो दो फ़िल्में भी देख डाली ।हर घंटे पाइलट घोषणा कर रहा था कि तूफ़ान के कारण हवाई जहाज़ उड़ाने की इजाज़त नहीं मिल रही है ,इजाज़त मिलते ही हम उड़ान भरेंगे ।

Pic Credit : AI generated image

फ़्लाइट लेट होने से हमें बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता था ।दिल्ली की उड़ान के लिए हमारे पास केवल डेढ़ घंटे का समय था, हम वहाँ रात के साढ़े तीन बजे पहुँचने वाले थे, इसलिए हमने रात बिताने के लिए एयरपोर्ट के ही एक होटल का कमरा बुक किया था, होटल से नैनीताल के लिए सुबह सात बजे की टैक्सी बुक की थी,दिन में नैनीताल पहुँचने पर घर की सफ़ाई हो जाने तक घर के पड़ोस के ही एक होटल फ़ेयरहैवन्स का एक कमरा बुक किया था, ये सब आनलाइन किया था। स्मिता ने सबको फ़्लाइट लेट होने की पूर्व सूचना दे दी फ़ेयर हेवन्स होटल को छोड़कर ,सबने पैनल्टी काट कर ओके कर दिया ।

चीन एक कम्युनिस्ट देश है और उसकी अपनी नीतियाँ हैं ।वह भारत के लिए सीधी उड़ान की व्यवस्था नहीं करता इसलिए हमें बैंकॉक के रास्ते आना-जाना पड़ता है ,जिससे समय का दुरुपयोग और बहुत सी परेशानियाँ होती हैं ।लेकिन अभी जब मैं ये यात्रा वृत्तांत लिखने बैठी हूँ,तो समाचारों में सुना कि जल्दी ही चायना दिल्ली के लिए सीधी उड़ान सेवा शुरू करने वाला है ।काश ऐसा हो जाए,तो लोगों की समस्याएँ कम हो जायेंगी ।

ये तो अच्छा हुआ कि स्मिता ने बड़ी दूरदर्शिता से काम लिया ।उसने रास्ते के लिए बहुत सा स्नैक्स और लंच डिनर के लिए थेपले ऑर्डर करके पैक कर लिए थे ।ग्वांग्झाउ में बहुत से भारतीय परिवार रहते हैं, उनमें से गुजरात की कुछ महिलाएँ स्वादिष्ट गुजराती व्यंजन सप्लाई करती हैं, जिन्हें बहुत दिनों तक सुरक्षित रखा जा सकता है । खांडवी व ढोकला का आनन्द तो हमने चायना में ही उठा लिया था ,थेपले हम रास्ते के लिए पैक कर लाये थे ।

दो दो फ़िल्में देखने के बाद बड़ी मुश्किल से उड़ान शुरू हुई ।उस दिन रनवे भी मुझे इतना बड़ा लगा ।उड़ान भरने के बाद हवाई मार्ग इतना ऊबड़ खाबड़ था, लग रहा था मानो हल्द्वानी की सड़कों पर यात्रा कर रहे हों । अपने ईष्टदेव को याद करते करते रात के दस बजे हम बैंकॉक पहुँचे लेकिन वहाँ एक बड़ी दुर्घटना हमारा इंतज़ार कर रही थी ।जहाज़ से उतरते समय स्मिता और उसके डैडी आगे निकल गये और मैं हैंडबैग व पर्स सँभालते सँभालते बहुत पीछे रह गई ।जैसे ही फ़्लाइट से बाहर निकले ,मैंने चारों ओर उन्हें ढूँढा लेकिन कहीं दिखाई नहीं दिये ।दरअसल हमारी दिल्ली की फ़्लाइट तो कबके निकल गई थी, हमें थाई एयरवेज़ वालों से दिल्ली की अगली फ़्लाइट के बारे में जानकारी लेनी थी, इसलिए वे दोनों उस काउंटर की ओर चले गये होंगे, मुझे ये पता नहीं चला और मैं अपनी फ़्लाइट से उतरी हुई भीड़ के साथ आगे बढ़ती गई । जब भीड़ एस्केलेटर से नीचे उतरी तो मैं भी उनके साथ उतर गई , वहाँ भी चारों ओर देखा, तो वे दोनों कहीं नहीं मिले ,फिर भीड़ दूसरे एस्केलेटर से उतरी तो मैं भी उतर गई ।मेरे फ़ोन में इन्टरनेशनल रोमिंग नहीं थी ,क्योंकि सारे काम तो स्मिता कर रही थी । अब मैं वास्तव में बहुत घबरा गई ।दो तीन लोगों से पूछा कि दिल्ली वाले यात्री किस ओर गये हैं,लेकिन उन्हें तो चायनीज और थाई भाषा के अलावा कोई और भाषा आती ही नहीं थी ,तब मुझे अपने देश के उन लोगों पर अफ़सोस हुआ,जो अंग्रेज़ी न बोल पाने वाले लोगों को हेय दृष्टि से देखते हैं । मैंने देखा कि लोग बुलेट ट्रेन से हवाई पट्टी की दूसरी ओर जा रहे हैं, तो मैं भी उनका अनुसरण करते हुए गिरते पड़ते दूसरी ओर चली गई ।जब वहाँ पहुँची,तो पूरे एयरपोर्ट में अफ़रातफ़री मची हुई थी ।अलग-अलग देशों के लोग अपनी अपनी फ़्लाइट का पता करने आए थे ।मैं भी इमिग्रेशन काउन्टर में चली गई, उन्होंने टिकट और पासपोर्ट दिखाने के लिए कहा, जो मेरे पास नहीं थे क्योंकि सारे पासपोर्ट स्मिता के पास ही थे ।जब उन्होंने कहा तब तो हम तुम्हारे लिए कुछ नहीं कर सकते, तब मुझे लगा कि ये लोग तो बहुत ही हृदयहीन हैं ।वहाँ खड़े कुछ भारतीय यात्री मेरी समस्या समझ गये, उनमें से एक ने मुझसे बात की ।मुझसे स्मिता का फ़ोन नंबर लेकर वीडियो कॉल कराया ।स्मिता की काँपती हुई आवाज़ सुनकर मुझे पता चला कि वे दोनों भी कितने परेशान थे ।मैंने उन्हें बताया कि मैं इमिग्रेशन काउन्टर के पास हूँ, वहीं पर आकर मुझे मिलो ।उन दोनों की आवाज़ सुनकर अब मेरे मन को तसल्ली मिली, फिर मैंने उन यात्रियों से बात की ,वे अहमदाबाद से आए थे ।तब मुझे लगा कि अपने गुजराती भाई कितने सहृदय होते हैं ।उन्हें धन्यवाद देकर मैं मुख्य गेट के पास खड़ी होकर इंतज़ार करने लगी ।मैं वहाँ खड़ी होकर सोच रही थी कि वैसे तो मैं बहुत ही शक्की स्वभाव की हूँ, यदि मैं भारत में होती, तो किसी अजनबी को अपनी बेटी का फ़ोन नंबर कभी नहीं देती लेकिन उस समय वे लोग अपने लग रहे थे और जिन्होंने मुझसे बात की उन्होंने इस्कॉन मंदिर के संन्यासियों की तरह लंबा टीका लगाया था, तो मुझे उनपर पूरा भरोसा हो गया । लगभग बीस मिनट में वे दोनों दूर से आते हुए दिखाई दिए, तो मेरी जान में जान आई ।स्मिता ने मुझे कस के गले लगाया, उसके आँसू बह रहे थे ।मैंने उससे पानी की बोतल ली और पूरी बोतल का पानी पी गई क्योंकि घबराहट के मारे मेरे गले में काँटे से चुभ रहे थे ।उसने कहा कि तेरे फ़ोन में टिकट और पासपोर्ट की कॉपी तो थी, तू शायद घबराहट में ये भूल गई होगी ।और मैं चकित होकर उन दोनों का मुँह ताकने लगी ।फिर उसने मुझे परेशान देख कर समझाया कि बीती बातों को भूल जाओ । अब हम इस बात की बिलकुल चर्चा नहीं करेंगे ।

ट्रांसफ़र काउन्टर पर बहुत ही भीड़ थी,किसी तरह ये पता चला कि दिल्ली की फ़्लाइट सुबह सात बजे जायेगी । हम जल्दी जल्दी लाउन्ज की ओर मुड़े, वहाँ बैठने के लिए आराम दायक सोफे लगे थे ,जो कि पर्याप्त नहीं थे क्योंकि लोग बहुत ज़्यादा थे ।पानी की बोतलें और कुछ स्नैक्स रखे हुए थे ,जो कि सब अंडे वाले थे । चायना की फ़्लाइट थी इसलिए हमें तो फ़्लाइट में भी कुछ खाने को नहीं मिला,क्योंकि सब मांसाहारी भोजन था ।स्मिता ने कहा था कि मील मत लेना,केवल ट्रे ले लेना,उसमें पानी की बोतल और योगट मिल जाएगा,मैंने वही किया, देखा तो शानदार सलाद भी रखा है ,मैं टोफ़ू समझ कर जैसे ही एक टुकड़ा मुँह में रखने लगी, फिर सोचा पूछ तो लूँ , शाकाहारी है या नहीं, अटेंडेंट एकदम घबरा कर बोला -no no don’t eat this,that’s chicken and beef salad. ख़ैर उसके बाद उनके पानी और कॉफ़ी के अलावा मैंने अन्य कुछ भी मुँह में नहीं डाला । कॉफ़ी के साथ ही थेपलों का आनन्द उठाया ।

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एक कमरे में एक डबल बैंड मेज़ और कुर्सियाँ रखी थीं । स्मिता के कहने पर,हमारी उम्र का लिहाज़ करके,वहाँ के एक यात्री ने जो कि इस्लामाबाद के थे हमारे लिए डबल बैड ख़ाली कर दी और स्वयं कुर्सी में बैठ गए । उस कमरे में कराँची ,लाहौर और रावलपिंडी के बहुत से यात्री थे ,जोकि नीचे कार्पेट में सोये हुए थे, क्योंकि उनकी फ़्लाइट दूसरे दिन शाम की थी ।मैं लेट तो गई किन्तु बिलकुल नींद नहीं आई ।मैंने देखा स्मिता को सोफ़े में ही नींद आ गई है,किन्तु उसकी गर्दन नीचे को लटक रही है ।मैंने उसे उठाया और कहा कि मुझे वॉशरूम जाना है ,इसलिए तू बिस्तर में सो जा ।पास के वॉशरूम की धुलाई चल रही थी ।उससे आगे के तीन चार औरों की भी धुलाई चल रही थी क्योंकि सुबह का समय था ,तो मैं बहुत आगे निकल गई । वहाँ मुझे १ वॉशरूम मिल गया । ब्रश करके हाथ मुँह धोकर और बाल बनाकर जब मैं बाहर निकली तो, दिग्भ्रमित हो गई ।वैसे भी बचपन से ही मैं दिशाओं के विषय में कमजोर रही हूँ । इधर-उधर भटकते- भटकते मुझे अपना लाउंज मिला ही नहीं ।दस चक्कर लगा दिए ।दिखावा ऐसा कर रही थी मानो वॉक करने निकली हूँ ।बहुत ढूँढने पर अंत में मुझे अपना गंतव्य मिल ही गया । स्मिता टकटकी लगाए दरवाज़े की ओर देख रही थी, मुझे देखते ही उसने पूछा कि एक घंटा कहा लगा दिया माँ ? मैंने कहा रास्ता भूल गई थी ।अगली फ़्लाइट तक अब कहीं मत जाना,उसने समझाया । मैंने कहा इस बार पता नहीं क्या दशा आई ,नहीं तो ये हमारा पाँचवाँ ट्रिप है चायना का , आज तक कभी भी कोई समस्या नहीं हुई ।

सुबह सात बजे की फ़्लाइट ठीक समय पर मिल गई । इस बार हम तीनों साथ में थे ।अच्छा शाकाहारी भोजन करने को भी मिल गया ।ठीक बारह बजे हम दिल्ली हवाई अड्डे पर पहुँचे लेकिन वहाँ एक और मुसीबत हमारा इंतज़ार कर रही थी ,एक घंटे तक सामान बेल्ट में अपने सूटकेसों का इंतज़ार करने पर पता चला कि दिल्ली वालों का सामान बैंकॉक से लोड ही नहीं हुआ । पूछताछ करने पर पता चला कि अगले दो दिन तीन दिन में पहुँचेगा ।अब बड़ी मुश्किल ये थी कि हमारे घर की चाबियों का गुच्छा तो सूटकेस में ही था ।हर बार बैंकॉक में हमारा पर्स चैक किया जाता था, इसलिए पिछले कुछ वर्षों से हम चाबियों को चैकइन सूटकेस में रख रहे थे ।स्मिता ने तीनों सूटकेसों का विवरण देकर शिकायत दर्ज करवाई, फिर हम दिल्ली एयरपोर्ट के ही एक होटल में,जहाँ हमने रात के लिए बुकिंग करवाई थी, दिन के एक बजे पहुँचे , आधे घंटे की तू तू मैं मैं के बाद हमें हमारा कमरा मिला ,ज़िसे उन्होंने किसी और को आवंटित कर दिया था ,जब हमने किराया वापस करने की धमकी दी,तो मैनेजर मुलायम पड़ गया और,फिर उन्होंने हमारा विशेष ध्यान रखा,कमरे में जाते ही चाय बिस्किट फिर कम्प्लिमेंट्री लंच भी दिया ।

ढाई बजे क़रीब हम नैनीताल के लिए रवाना हुए ,जहाँ हमने अपने घर के पड़ोस के ही एक होटल फेयरहैवन्स का कमरा बुक कराया था ,जब तक कि हमारे घर की सफ़ाई न हो जाय।ऑनलाइन टैक्सी ने भी पेनल्टी काटी ,लेकिन वह टैक्सी सी एन जी वाली थी ,जो रास्ते भर फ़्यूल भरवाते हुए चल रही थी,जिससे हमें नैनीताल पहुँचने में बहुत देर हो गई ।मुरादाबाद पहुँचे ही थे कि होटल के मैनेजर का फ़ोन आया कि बहुत देर हो गई,आप कब पहुँच रहे हैं? उसकी अपनत्व भरी उलाहना सुनकर मेरी बेटी तो गद्गगद् हो गई । आधे घंटे बाद फिर फ़ोन आया कि आप लोगों का लिए डिनर रखा है ,मीठे के लिए साथ में गुलाब जामुन भी रख दूँ क्या? सच बताऊँ रास्ते भर की सारी परेशानियाँ और थकान उड़नछू हो गई मन इतना हल्का हो गया कि लग रहा था,कब नैनीताल पहुँचें । रात के ग्यारह बजे होटल पहुँचे,तो उन लोगों ने इतना अच्छा स्वागत किया, ड्राइवर के रहने का इंतज़ाम भी किया । होटल मालिक स्वयं मिलने आगये और हमारी कष्टप्रद यात्रा के बारे में सुनकर उन्होंने मैनेजर से खाना कमरे में ही भिजवाने के लिए कहा । उन्हें धन्यवाद देकर हम कमरे में गये ।नहाने के बाद खाना खाया और गहरी नींद सो गये ।सुबह उठकर बाहर का ख़ूबसूरत नज़ारा और नैना मंदिर और ताल का फ़ोटो लेकर सभी परिचितों को नैनीताल से शुभ प्रभात का संदेश भेज दिया । सुबह नहाने के बाद होटल के लॉन में बैठकर शानदार नाश्ता किया । होटल मालिक शर्मा जी भी हमारे साथ बैठ गए ।जब उन्हें पता चला कि हमारा सामान बैंकॉक से अभी नहीं आया है तो उन्होंने हमें सान्त्वना दी कि जब तक सामान नहीं आ जाता, और घर की सफ़ाई नहीं हो जाती ,आप आराम से यहाँ रह सकते हैं । जब काम हो जाएगा, तब होटल से चैकआउट करा सकते हैं । हमें बड़ी तसल्ली मिली ।

घर गये ,पड़ोसियों ने चाय भिजवाई ।एक चाबी वाले को बुलाकर ताले तुड़वाये । इंटरलॉक सिस्टम पूरा तोड़ कर कारपेन्टर को बुलाकर नया लॉक लगवाना पड़ा । काम वाली को बुलाकर,हम सबने उसके साथ मिलकर घर की सफ़ाई शुरू की । लंच में फिर थेपले काम आये । तभी थाईएयरलाइंस वालों का फ़ोन आया कि दिल्ली से एक टैक्सी द्वारा आपका सामान चल चुका है, हमें बहुत ग़ुस्सा आया क्योंकि उन्होंने कहा था कि सामान पहुँचने में तीन चार दिन लगेंगे ।ग़नीमत रही कि हमने अंदर के कमरों के ताले नहीं तुड़वाये थे । शाम को ही स्मिता होटल में चैकआउट करा कर सामान ले आई ।शाम तक तीनों सूटकेस भी पहुँच गए ।एक सूटकेस का ताला तोड़कर तार से बाँधा गया था,क्योंकि उसमें एक घड़ी रखी थी ।खैर हम सामान देखकर इतने खुश हो गये कि ,हमने उसे चैक भी नहीं किया ।हालाँकि इस यात्रा में हमारा आर्थिक और मानसिक नुक़सान बहुत हुआ लेकिन फिर भी लगा कि चलो बला टल गई, इसलिए दूसरे ही दिन हम लोगों ने नैना मंदिर जाकर,प्रसाद चढ़ाया और कुशल पूर्वक नैनीताल पहुँचाने के लिए माँ का धन्यवाद किया ।

अब तो हमारा घर भी सैट हो गया है ।स्मिता भी वापस चायना पहुँच गई । लेकिन इस यात्रा का पूरा प्रकरण मैं कभी नहीं भुला सकती । मुझे रात में जब भी नींद खुलती है, तो वही दृश्य बार बार दिखाई देता है मूसलाधार बारिश,टाइफ़ून तूफ़ान, आसमान में खड़ खड़ करता हुआ हवाई जहाज़ ,एयरपोर्ट में दो बार अपना खो जाना और सामान बैल्ट में सामान का न पहुँचना व सबसे बुरा तो बीफ के टुकड़े को अपने मुँह तक ले जाना ,लेकिन जब होटल मैनेजर की अपनेपन से भरी हुई आवाज़ कानों में पड़ती है,कि कब आ रहे हो? डिनर रख दिया गया है ।तब सारा मानसिक तनाव और उद्विग्नता ख़त्म हो जाती ।

लेखिका परिचय : श्रीमती पार्वती जोशी हिंदी की लेखिका हैं. इनकी कई कहानिया कई राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं में छप चुकी है. नैनीताल के प्रतिष्ठित स्कूल सेंट मैरीज कॉलेज से हिंदी अध्यापक के पद से आप सेवानिवृत्त हुई है.

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