आलेख-: आचार्य पंडित प्रकाश जोशी गेठिया नैनीताल
इस बार कई वर्षों बाद मकर संक्रांति और षटतिला एकादशी व्रत दिनांक 14 जनवरी 2026 को एक साथ मनाया जाएगा जो एक दुर्लभ और अत्यंत शुभ संयोग है। सिर्फ इतना ही नहीं सर्वार्थ सिद्धि योग एवं अमृत सिद्धि योग भी बन रहे हैं इस महापर्व पर। इस दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश कर उत्तरायण होंगे और भगवान विष्णु को समर्पित षटतिला एकादशी भी इस दिन है। जिससे इस दिन किया गया स्नान ,दान, जप तप कई गुना अधिक फलदाई होगा जो पापों का नाश कर सुख समृद्धि प्रदान करता है।
शुभ मुहूर्त-:
इस बार दिनांक 14 जनवरी 2026 दिन बुधवार को मकर संक्रांति पर्व एवं षटतिला एकादशी व्रत मनाया जाएगा। इस दिन यदि एकादशी तिथि की बात करें तो शाम 5:53 बजे तक एकादशी तिथि रहेगी। अनुराधा नामक नक्षत्र अगले दिन प्रातः 3:04 बजे तक है। यदि इस दिन के चंद्रमा की स्थिति को जानें तो इस दिन चंद्र देव वृश्चिक राशि में विराजमान रहेंगे। सबसे महत्वपूर्ण यदि इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग एवं अमृत सिद्धि योग की बात करें तो इस दिन प्रातः 7:12 बजे से अगले दिन प्रात 3:04 बजे तक यह दोनों योग बने रहेंगे। इन सबसे महत्वपूर्ण यदि इस दिन के स्नान दान के शुभ मुहूर्त की बात करें तो इस दिन स्नान दान का शुभ मुहूर्त दोपहर 3:05 से प्रारंभ होगा क्योंकि सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश दोपहर 3:05 पर करेंगे।
मकर संक्रांति भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है। प्रकृति और कृषि को जोड़ने वाला यह पवित्र पर्व पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है। उत्तराखंड का लोक पर्व घुघुतिया के रूप में मनाया जाता है। कुमाऊं अंचल में बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। मकर संक्रांति और उत्तरायणी के इस पावन पर्व पर लोग घरों में घुघुते बनाकर इस त्योहार की तैयारियों में जुटे रहते हैं। पूरे कुमाऊं मंडल में इस त्योहार को बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है।
घुघुतिया त्योहार- :
घुघुतिया त्योहार 14 जनवरी को मनाया जाएगा। लेकिन त्योहार से एक दिन पहले आटा, तेल, सूजी, दूध, घी और गुड़ के पानी से घुघुती पकवान बनाने की परंपरा है। घुघुतिया त्योहार कुमाऊं मंडल का प्रमुख त्योहार माना जाता है। घुघुतिया त्यौहार कुमाऊं का लोक पर्व के नाम से जाना जाता है। इस पर्व को लेकर विशेष व्यंजन तैयार किए जाते हैं, जिसे घुघुते कहा जाता है। घुघुते की एक विशेष आकृति हिन्दी के अंक ४की आकृति के अलावा विभिन्न खिलौनों का आकार देकर व्यंजन बनाए जाते हैं। मीठे आटे से बने इन ‘घुघुतों’ को एक माला में पिरोया जाता है और छोटे बच्चे इसकी माला बनाकर मकर संक्रांति के दिन अपने गले में डालकर कौवों को आवाज देकर बुलाते हैं और उन्हें घुघुत खाने का न्यौता दिया जाता है।
छोटे बच्चे इस तरह से गीत गाते हुए कौवों को आमंत्रित करते हैं-
काले कौवा काले,घुघती माला खाले।
ल्हे कौवा बौड़,मैंकै दीजा सुनुक घौड़।
ल्हे कौवा पूड़ी,मैंकै दीजा सुनुक छूरि।
ल्हे कौवा तलवार,मैंकै दीजा ठूलो घर-बार।
आदि आदि।
घुघुति त्यार के संबंध में प्रचलित लोककथाः-
मान्यता है कि वर्षों पूर्व कुमाऊं में चन्द्र वंश के राजा शासन किया करते थे। उन्हीं में से एक राजा कल्याण चंद की कोई संतान नहीं थी। उत्तराधिकारी न होने के कारण उनके मंत्री को यह विश्वास था कि राजा के बाद राज्य मुझे ही मिलेगा। एक बार राजा कल्याण चंद बागेश्वर के बाघनाथ मंदिर में गए और संतान के लिए प्रार्थना की।भगवान बाघनाथ की कृपा से राजा का एक बेटा पैदा हुआ, जिसका नाम निर्भयचंद रखा गया। निर्भयचंद को उसकी मां प्यार से ‘घुघुती’ के नाम से बुलाया करती थी। घुघुती के गले में एक मोती की माला थी, जिसमें घुंघुरू लगे हुए थे। इस माला को पहनकर घुघुती बहुत खुश रहता था। जब वह किसी बात पर जिद करता तो उसकी मां उससे कहती कि जिद न कर, नहीं तो मैं माला कौवे को दे दूंगी। अपने पुत्र को डराने के लिए मां कहती कि ‘काले कौवा काले घुघुती की माला खाले’ जिसको देखकर घुघुती जिद छोड़ देता था। यह सुनकर कई बार कौवे आ भी जाते थे। जब मां के बुलाने पर कौवे आ जाते तो वह उनको कोई चीज खाने को दे देती। धीरे-धीरे घुघुती की कौवों के साथ दोस्ती हो गई।
राजा कल्याण चंद के बेटा पैदा होने के बाद मंत्री को लगा कि अब राजा कल्याण चंद्र का उत्तराधिकारी वह नहीं बन पाएगा। मंत्री आए दिन राजा के बेटे घुघुती को मारने की तरकीब सोचने लगा, ताकि उसी को राजगद्दी मिल सके। मंत्री अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर घुघुती को मारने की योजना बनाकर एक दिन चुपके से उसको उठाकर जंगल की ओर ले जाते हैं। जिसे एक कौवे ने देख लिया और जोर-जोर से कांव-कांव करने लगा। अपने मित्र कौवे की आवाज सुनकर घुघुति जोर-जोर से रोने लगा और अपनी माला को उतारकर दिखाने लगा धीरे धीरे कई कौवे एकत्रित हो गए और उनमें से एक कौवा घुघुती के हाथ से माला लेकर उड़ गया अन्य सभी कौवों ने मंत्री और उसके साथी पर हमला कर दिया।अचानक हुए हमले से घबराकर मंत्री और उसके साथी भाग खड़े हुए। घुघुती जंगल में अकेला रह गया और एक पेड़ के नीचे बैठ गया। तथा सभी कौवे भी उसी पेड़ में बैठ गए जो कौवा हार लेकर गया था, वह सीधा महल में जाकर एक पेड़ पर माला टांग कर जोर-जोर से कांव कांव करने लगा। घुघुती की मां ने बेटे के हार को पहचान लिया, इसके बाद कौवा एक पेड़ से दूसरे में उड़ने लगा और राजा और घुड़सवार सैनिक घुघुती की तलाश में उसका पीछा करने लगे। कौवा एक पेड़ पर जाकर रुक गया। राजा ने देखा कि पेड़ के नीचे उसका बेटा सोया हुआ है, राजा घुघुती को लेकर घर लौट आया। राजा ने मंत्री और उसके साथियों को इस अपराध के लिए मृत्युदंड दिया। घुघुति के घर वापस आने पर मां ने बहुत सारे पकवान बनाए और घुघुती ने अपने मित्र कौवों को बुलाकर पकवान खिलाए। यह बात धीरे-धीरे पूरे कुमाऊं में फैल गई इसने बच्चों के लोकपर्व का रूप ले लिया।



















