आलेख -: आचार्य पंडित प्रकाश जोशी गेठिया नैनीताल
माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को बसंत पंचमी का त्यौहार मनाया जाता है। इस बार यह त्यौहार 23 जनवरी 2026 दिन शुक्रवार को मनाया जाएगा।
शुभ मुहूर्त-:
इस बार दिनांक 23 जनवरी 2026 दिन शुक्रवार को श्री पंचमी पर्व मनाया जाएगा। इस दिन यदि पंचमी तिथि की बात करें तो 46 घड़ी 32 पल अर्थात मध्य रात्रि 1:46 बजे तक पंचमी तिथि रहेगी। इस दिन पूर्वाभाद्रपद नामक नक्षत्र 18 घड़ी 30 पल अर्थात दोपहर 2:33 बजे तक है। यदि योग की बात करें तो परिधि नामक योग 22 घड़ी पांच पल अर्थात शाम 3:59 बजे तक है। सबसे महत्वपूर्ण यदि इस दिन के चंद्रमा की स्थिति को जानें तो इस दिन चंद्र देव प्रातः 8:30 बजे तक कुंभ राशि में विराजमान रहेंगे तदुपरांत चंद्र देव मीन राशि में प्रवेश करेंगे।
वैसे तो संपूर्ण भारत में यह त्यौहार मनाया जाता है, परंतु देवभूमि उत्तराखंड के कुमाऊं संभाग में यह त्यौहार कुछ विशेष रीति से मनाया जाता है, जिसे कुमाऊं में श्री पंचमी का त्यौहार कहते हैं। कुमाऊं में यह त्यौहार बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस त्यौहार में विशेष यह है कि इस दिन खेतों से जौं की पत्तियां लाकर सर्वप्रथम स्नान करने के उपरांत जौं की पत्तियां मंदिरों, देवालयों में चढ़ाई जाती है। फिर परिवार के सभी सदस्य एक दूसरे को हरेले की तरह जौं पूजते हैं। लड़कियां अपने माता-पिता, भाई-बहन, चाचा-चाची, ताऊ ताई आदि घर के सभी सदस्यों के सिर में जौं पूजती हैं। बालिकाएं इस पावन दिन अपने नाक-कान छिदवाती हैं।
देवभूमि उत्तराखंड के कुमाऊं संभाग में इस पावन दिवस का एक और महत्व इस कारण से भी है कि बसंत पंचमी के दिन से ही कुमाऊंनी बैठकी होली का आरंभ भी इस दिन से होता है। कुमाऊंनी बैठकी होली की परंपरा के अनुसार इस पावन दिवस से लेकर फाल्गुन शुक्ल पक्ष एकादशी अर्थात आंवला एकादशी तक बैठकी होली गायन चलता है। इसी प्रकार बैठकी
होली के गायन के प्रारंभ के साथ ही होली के उत्सव का प्रारंभ भी हो जाता है। हमारे प्राचीन ग्रंथों के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने 8400000 योनियों के साथ मनुष्य योनि की रचना की, इसके बावजूद भी वे अपनी इस रचना से पूर्णतया संतुष्ट नहीं थे। उन्हें लगता था कि सृष्टि में कुछ कमी रह गई है। जिस कारण मौन छाया रहता है।
अंत में विष्णु भगवान से आज्ञा लेकर ब्रह्मा ने अपने कमंडल से पृथ्वी पर जल छिड़का। जिस कारण जल के कण बिखरते ही उसमें कंपन होने लगा तथा वृक्षों के बीच से एक अद्भुत शक्ति प्रकट हुई। प्रकृति का यह प्राकट्य एक चतुर्भुज देवी के रूप में था, उसके एक हाथ में वीणा थी तथा दूसरा हाथ वर देने की मुद्रा में था। अन्य दो हाथों में पुस्तक एवं माला थी। ब्रह्मा ने देवी को हाथ जोड़कर प्रणाम किया तथा उनसे वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा के तारों को झंकृत किया, मधुर नाद से धरती के सभी जीव-जंतुओं को वाणी प्राप्त हो गई। विश्व के समस्त जल धाराओं में स्वरों का संचार होते ही उसमें कोलाहल व्याप्त हो गया। सीधे शब्दों में कहें तो ध्वनि की उत्पत्ति उसी समय से प्रारंभ हुई। पाठकों की जानकारी हेतु बताना चाहूंगा कि ऋग्वेद में कहा गया है कि-
प्रणोदेवी सरस्वती वाजेभिवर्जिनीवती धीनामणित्रयवततु। अर्थात यह परम चेतना है, सरस्वती के रूप में यह हमारी बुद्धि प्रज्ञा तथा मनोगति की संरक्षिका है। हममें जो आचार और मेधा है, उसका आधार देवी भगवती सरस्वती ही है।
कुमाऊं के अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़, नैनीताल, चंपावत जनपदों के कई भागों में इस दिन जौ की पत्तियां गाय के गोबर के साथ टीका चंदन कर घर की देहरी पर भी रखते हैं। देवभूमि के कई भागों में इस दिन यज्ञोपवीत चूडाकर्म संस्कार भी करवाए जाते हैं। बसंत पंचमी के दिन छोटे बच्चों की शिक्षा-दीक्षा आरंभ करने के लिए भी लिए भी यह पावन दिन अत्यंत शुभ माना जाता है। इस पावन दिवस पर बच्चे की जीभ में मधु अर्थात शहद से ॐ बनाना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि ऐसा करने से बच्चे ज्ञानवान बनते हैं। क्योंकि जिह्वा का संबंध मां सरस्वती से है। वाणी जो जिह्वा से प्रकट होती है, उसका संबंध भी मां सरस्वती से है। इसके अतिरिक्त 6 माह पूरे कर चुके बच्चे को अन्न का पहला निवाला अर्थात अन्नप्राशन के लिए भी यह पावन दिन शुभ माना जाता है। इस दिन मुहूर्त निकलवाने की आवश्यकता नहीं होती है। बसंत पंचमी के दिन सरसों के खेतों में सुनहरी चमक फैल जाती है। पेड़ों पर फूल खिलने लगते हैं। संपूर्ण धरती श्रृंगार करती है।
पूजा विधि एवं महत्वपूर्ण मंत्र-:
वसंत पंचमी के दिन, माँ सरस्वती की पूजा करते समय, पीले फूल और पीले वस्त्र धारण कर इन मंत्रों का जाप करना शुभ माना जाता है, जिससे ज्ञान और कला के क्षेत्र में सफलता मिलती है।
विद्या मंत्र-:
या देवी सर्वभूतेषु विद्यारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥
गायत्री मंत्र (सरस्वती के लिए):-
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥ (यह एकाग्रता और बुद्धि के लिए है)
वाग्देवी मंत्रः-
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं वाग्देव्यै सरस्वत्यै नमः।
ध्यान मंत्रः-
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥ (यह जड़ता दूर करने के लिए है)।



















