गुरु पूर्णिमा : बुधादित्य योग, गज केसरी योग और प्रीति योग में मनाया जाएगा इस बार गुरु पूर्णिमा पर्व

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बुधादित्य योग, गज केसरी योग और प्रीति योग में मनाया जाएगा इस बार गुरु पूर्णिमा पर्व . इस बार दिनांक 29 जुलाई 2026 दिन बुधवार को गुरु पूर्णिमा पर्व मनाया जाएगा।

शुभ मुहूर्त-:
इस दिन यदि पूर्णिमा तिथि की बात करें तो छत्तीस घड़ी 17 पल अर्थात शाम 8:05 तक पूर्णिमा तिथि रहेगी। यदि नक्षत्र की बात करें तो इस दिन उत्तराषाढ़ा नामक नक्षत्र 25 घड़ी सात पल अर्थात शाम 3:37 तक है। यदि प्रीति योग की बात करें तो यह योग 46 घड़ी 0 पल अर्थात मध्य रात्रि 11:58 तक रहेगा . यदि चंद्रमा की स्थिति जानें तो इस दिन चंद्र देव पूर्ण रूप से मकर राशि में विराजमान रहेंगे।

महत्व-:
सनातन धर्म में गुरु पूर्णिमा पर्व बहुत महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। जहां एक ओर इस दिन पंचम वेद कहे जाने वाले धर्म ग्रंथ महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास जी का जन्मोत्सव मनाया जाता है वहीं दूसरी ओर इस दिन गुरुजनों का आदर सम्मान करने का विशेष दिन माना जाता है।

गुरु का स्थान भगवान से भी ऊंचा माना गया है। अनेकों लेखकों एवं कवियों ने गुरु की महिमा का वर्णन किया है गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए कबीर दास जी ने कहा है-
गुरु गोविंद दोऊं खड़े काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए।।
अर्थात कबीर दास जी कहते हैं कि यदि भगवान और गुरु एक साथ खड़े हो तो सर्वप्रथम पूजनीय गुरु है क्योंकि उन्होंने ही सर्वप्रथम भगवान के दर्शन करने का दिशा निर्देश दिया है। यहां तक की कबीर दास जी ने गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए आगे कहा है कि-
सब धरती कागद करूं लेखनी सब वनराय। सात समंदर की मसी करूं गुरु गुन लिखा न जाए।।
अर्थात इस धरती के बराबर कागज हो, समस्त वृक्षों की लेखनी(कलम) बनाई जाए, और सात समुद्र के जल के बराबर मसी (स्याही,इंक) बनाई जाए इसके बावजूद भी गुरु की महिमा लिखनी कम है।
गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरु देवो महेश्वर:। गुरु साक्षात परम ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः।।
अर्थात गुरु ब्रह्मा है जैसे ब्रह्मा जी संसार बनाते हैं वैसे ही गुरु हमारे जीवन में ज्ञान और नए विचारों का निर्माण करते हैं। गुरु विष्णु हैं जैसे विष्णु जी इस दुनिया को संभालते हैं ठीक वैसे ही गुरु हमारे ज्ञान और अच्छे संस्कारों की रक्षा करते हैं। गुरु महेश्वर अर्थात शिव है जैसे शिव संहार करते हैं वैसे गुरु हमारे मन के बुरे गुणों और अज्ञान को मिटाते हैं। गुरु ही प्रत्यक्ष रूप से परमात्मा का रूप हैं। ऐसे महान गुरु को मेरा बार-बार प्रणाम है।

इसके अतिरिक्त आज के दिन महर्षि वेद व्यास जी के जन्मोत्सव की कथा श्रवण करना भी शुभ माना जाता है।

महर्षि वेदव्यास जन्मोत्सव कथा-:
एक समय की बात हैं, महान तेजस्वी मुनिवर पराशर जी तीर्थ यात्रा कर रहे थे, घूमते हुए वे यमुना नदी पावन तट पर आये। संयोगवश मुनि ने सुन्दर नेत्रों वाली कन्या को देखा और उस पर आसक्त हो गये। उन्होंने कन्या का हाथ पकड़ लिया तब सुन्दर नेत्रों वाली कन्या ने मुनि को इस प्रकार कहा- “मेरा नाम सत्यवती है मैं एक -निषाद कन्या हूँ आपका कुल उत्तम हैं मेरी देह से मछलियों की दुर्गन्ध निकलती हैं, इस कारण मेरा नाम मत्स्यगंधा भी हैं फिर आप मुझ पर इस प्रकार कैसे आसक्त हो गये” मत्स्यगंधा के वचन सुनकर मुनि ने अपने तेज से मत्स्यगंधा को कस्तुरी की सुगंध वाली बना दिया जिसकी खुशबु चारों और फैल गई ।तब उसने कहा मैं एक क्वारी कन्या हूँ यह मेरे लिए अपराध हैं। तब मुनि ने कहा हे मत्स्यगंधा! तुम मेरा प्रिय कार्य करने पर भी तुम कन्या ही रहोगी, हे सुन्दरी ! तुम्हें जो भी अभीष्ट है वह वर मांग लो। सत्यवती बोली- “आदर प्रदान करने वाले मुनि जी ! आप ऐसी कृपा कीजिये जिससे मेरे माता पिता कभी इस रहस्य को न जान सकें, मेरा कन्या व्रत भंग न हो पाए। हे मुनिवर ! मेरा आपके ही समान बलशाली पुत्र हो, मेरी यह सुगंध सदैव बनी रहे , मैं सदैव नवयुवती बनी रहूं।पराशर जी बोले – सुन्दरी तुम्हारा पुत्र वेदों, पुराणों का रचयिता होगा वेद के रहस्यों को जानने वाला होगा। युगों युगों तक इस संसार में पूज्यनीय रहेगा। तीनों लोकों में उसकी प्रतिष्ठा स्थिर होगी। मुनिवर के ऐसा कहने पर सत्यवती अनुकूल हो गई।सत्यवती ने कहा हे मुनिवर! ये जन समाज देख रहा है। युक्तिपूर्ण वचन सुनकर पराशर जी ने अपने तप से घना कोहरा कर दिया। कोहरे के कारण घना अंधकार छा गया। तत्पश्चात यमुना में स्नान कर मुनि तुरंत वहाँ से चले गये। सत्यवती भी पिता के घर आ गई। कुछ समय अन्तराल बाद सत्यवती ने यमुना के तट पर सुन्दर पुत्र को जन्म दिया। जन्म के समय ही वह बालक तुरंत बड़ा हो गया और अपनी माता से बोला माता मुझ में असीम शक्ति है मन को तपोनिष्ट बनाकर मैंने आपके गर्भ में प्रवेश किया है।अब आप अपनी इच्छानुसार जा सकती हैं, मैं भी तपस्या करने जाता हूँ।

माता ! आपके समक्ष कभी कठिन समय आये तो आप तुरंत मेरा स्मरण करना मैं तुरंत आपकी सेवा में आ जाऊंगा। ऐसा कहकर व्यास जी वहाँ से चले गये। सत्यवती भी अपने पिता के पास चली आई। यमुना तट पर व्यास जी को जन्म देने के कारण उन्हें द्वैपायन नाम से भी जाना जाता है। वेद का विस्तार करने के कारण उनका नाम वेदव्यास पड़ा। पुराण संहिताएं तथा महाभारत वेदव्यास जी की रचनायें हैं।

आलेख-: ज्योतिषाचार्य पंडित प्रकाश जोशी गेठिया नैनीताल।