आश्विन मास के कृष्ण पक्ष को महालय पक्ष कहते हैं। माना जाता है कि इस पक्ष में पितृ गण स्वर्ग लोक से भूलोक में भ्रमण करने आते हैं। भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा एवं आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की 15 तिथियां मिलकर 16 श्राद्ध माने गए हैं। इस बार सन 2026 में दिनांक 26 सितंबर 2026 से 10 अक्टूबर 2026 तक सोलह श्राद्ध हैं। इसी क्रम में दिनांक 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध, 27 सितंबर को प्रतिपदा श्राद्ध, 28 को द्वितीय श्राद्ध, 29 को तृतीय श्राद्घ, 30 को चतुर्थी एवं पंचमी श्राद्ध, 1 अक्टूबर को षष्ठी श्राद्ध, 2 अक्टूबर को सप्तमी श्राद्ध, तीन को अष्टमी श्राद्ध (अष्टका), 4 अक्टूबर को नवमी श्राद्ध (अनवष्टका), पांच को दशमी श्राद्ध, 6 को एकादशी श्राद्ध (इंदिरा एकादशी), सात को द्वादशी श्राद्ध, आठ को त्रयोदशी श्राद्ध, 9 अक्टूबर को चतुर्दशी श्राद्ध (शस्त्रादि हतानां श्राद्ध) अर्थात जिनकी मृत्यु अस्त्र-शस्त्र आदि से हुई हो या सड़क दुर्घटना आदि में हुई हो। तथा दिनांक 10 अक्टूबर को पितृ विसर्जन अमावस और जिन्हें श्राद्ध की तिथि ज्ञात न हो।
हमारे देवभूमि के कुमाऊं संभाग में छः पीढ़ीयों तक के पितरों के नाम के संकल्प लिए जाते हैं। जिनमें तीन पीढ़ी घर के, दो पीढ़ी नौनिहाल के, तथा एक पीढ़ी ससुराल पक्ष का होता है। जैसे की उदाहरणार्थ –
मेरे परम पूज्य पिताजी स्व०पंडित श्री बद्री दत्त जोशी, दादाजी स्व०पंडित दयाकिशन जोशी, परदादा स्व०पंडित बाल किशन जोशी उनके भी पिताजी स्व०पंडित गजाधर जोशी आदि आदि। जबकि कंही-कंही 21 पीढीयों तक के पूर्वजों के नाम के संकल्प लिए जाते हैं। जिसमें सात पीढ़ी घर के, सात पीढ़ी नौनिहाल के, तथा सात पीढ़ी ससुराल पक्ष के शामिल होते हैं।
हिंदू धर्म में इन दिनों का विशेष महत्व माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि पितृपक्ष में श्राद्ध और तर्पण करने से पितर प्रसन्न होते हैं। और आशीर्वाद प्रदान करते हैं। पितरों की कृपा से जीवन में आने वाली कई तरह की बाधाएं दूर होती हैं। व्यक्ति को कई तरह की समस्याओं से भी मुक्ति मिलती है। सनातन धर्म में ऐसी मान्यता है कि पितृपक्ष में पितरों का स्मरण और उनकी पूजा करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। श्राद्ध न होने की स्थिति में आत्मा को पूर्ण मुक्ति नहीं मिलती है। विद्वानों के अनुसार पितृपक्ष में नियमित रूप से दान पुण्य करने से जातक की कुंडली में पित्र दोष भी दूर हो जाता है। इस पितृपक्ष में हर व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने पितरों को नियमित रूप से प्रतिदिन जल अर्पित करें।
ब्रह्म पुराण के अनुसार –
“श्राद्धं न कुरुते मोहात तस्य रक्तं पिवन्ति ते”
अर्थात पूर्णिमा श्राद्ध से अमावस यानी कि पितृ विसर्जन तक जो संतानें अपने पितरों का श्राद्ध नहीं करते हैं, बाध्य होकर पितरों को सगे संबंधियों का रक्तपान करना पड़ता है।
पाठकों को एक महत्वपूर्ण बात बताना चाहूंगा की पितरों को जल अर्पित करते समय दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके मध्यान्ह अर्थात दोपहर के समय जल अर्पित किया जाता है। जिस तिथि को पूर्वज का देहांत हुआ हो ठीक उसी तिथि में वस्त्र और अन्न दान किया जाता है।
श्राद्ध परंपरा कब से शुरू हुई? या इस भूलोक में सबसे पहले श्राद्ध किसने किया है? पाठकों को बताना चाहूंगा महाभारत के अनुशासन पर्व मैं भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को श्राद्ध के संबंध में कई ऐसी बातें बताई हैं। जो वर्तमान समय में बहुत कम लोग जानते हैं। महाभारत के अनुसार श्राद्ध का उपदेश महर्षि निमी को महा तपस्वी अत्रि मुनि ने दिया था। इस प्रकार सबसे पहले महर्षि निमि ने श्राद्ध का आरंभ किया। महर्षि निमि की देखा देखी अन्य महर्षि भी श्राद्ध करने लगे। धीरे-धीरे चारों वर्णों के लोग श्राद्ध में पितरों को अन्न देने लगे इस प्रकार लगातार श्राद्ध का भोजन करते करते देवता गण एवं पित्र गण पूर्ण तृप्त हो गए इतने तृप्त हो गए की पितरों को अजीर्ण (भोजन न पचने वाला) रोग हो गया और उन्हें इस रोग से बहुत कष्ट होने लगा। तब सभी ऋषि मुनि ब्रह्मा जी के पास गए और उनसे कहा कि श्राद्ध का अन्न खाते-खाते हमारी गत खराब हो गई है। अब हमें बहुत कष्ट होने लग गया है। अब आप ही हमारा कल्याण कर सकते हैं। पितरों की बात सुनकर ब्रह्मा जी बोले चिंता करने की कोई बात नहीं है इस बीमारी का भी इलाज है। मेरे निकट अग्निदेव बैठे हैं। यही आपका कल्याण करेंगे। ऋषि-मुनियों ने अग्नि देव को प्रणाम कर कहा अग्नि देव हमारा कल्याण कीजिए। अग्निदेव बोले पितरों अब से श्राद्ध में हम लोग साथ ही भोजन किया करेंगे। मेरे साथ रहने से आप लोगों का अजीर्ण रोग दूर हो जाएगा। यह सुनकर देवता तथा पितर प्रसन्न हो गए। इसलिए श्राद्ध में सबसे पहले अग्नि का भाग दिया जाता है। इस तरह से श्राद्ध की यह परंपरा आगे बढ़ती चली गई और पितरों का श्राद्ध करके ब्राह्मणों को भोजन करवाया जाने लगा। हमारे हिंदू धर्म शास्त्रों में इस बात का भी उल्लेख है की हवन में जो पितरों के निमित्त पिंडदान किया जाता है उसे ब्रह्मराक्षस भी दूषित नहीं कर पाते हैं। श्राद्ध में अग्नि देव को देखकर राक्षस भी वहां से चले जाते हैं। क्योंकि अग्नि हर चीज को पवित्र कर देती है। और पवित्र खाना मिलने से देवता और पितर भी प्रसन्न होते हैं।
आलेख- ज्योतिषाचार्य पंडित प्रकाश जोशी गेठिया नैनीताल



















