आलेख-: आचार्य पंडित प्रकाश जोशी गेठिया नैनीताल
इस बार 27 मई को मनाया जाएगा
अधिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को कमला एकादशी या पद्मिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। यह महत्वपूर्ण व्रत प्रत्येक 32 मास यानी कि हर तीसरे वर्ष आता है। इस बार कमला एकादशी व्रत दिनांक 27 मई 2026 दिन बुधवार को मनाया जाएगा।
शुभ मुहूर्त-:
इस दिन यदि एकादशी तिथि की बात करें तो दो घड़ी 42 पल यानी कि प्रातः 6:22 तक एकादशी तिथि रहेगी तदुपरांत द्वादशी तिथि प्रारंभ होगी। क्योंकि कमला एकादशी व्रत द्वादशी युक्त तिथि में ही मनाया जाता है। इस दिन हस्त नक्षत्र एक घड़ी 40 पल अर्थात प्रातः 5:57 तक है। व्यतिपात योग 55 घड़ी 20 पल अर्थात रात्रि 3:25 तक है। सबसे महत्वपूर्ण यदि इस दिन के चंद्रमा की स्थिति को जानें तो इस दिन चंद्र देव शाम 7:00 बजे तक कन्या राशि में विराजमान रहेंगे तदुप्रांत चंद्रदेव तुला राशि में प्रवेश करेंगे।
कमला एकादशी (पद्मिनी एकादशी) व्रत कथा-:
धर्मराज युधिष्ठिर बोले- हे जनार्दन!
अधिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है तथा उसकी विधि क्या है?
कृपा करके आप मुझे बताइए।
श्री भगवान बोले हे राजन्! अधिक मास में शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है वह पद्मिनी (कमला) एकादशी कहलाती है। वैसे तो प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियाँ होती हैं। जब अधिक मास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है।
अधिक मास या मलमास को जोड़कर वर्ष में 26 एकादशी होती है। अधिक मास में दो एकादशी होती है जो पद्मिनी एकादशी (शुक्ल पक्ष) और परमा एकादशी (कृष्ण पक्ष) के नाम से जानी जाती है। ऐसा श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को इस व्रत की कथा बताई थी।
भगवान कृष्ण बोले- अधिक मास में अनेक पुण्यों को देने वाली एकादशी का नाम पद्मिनी है। इसका व्रत करने पर मनुष्य कीर्ति प्राप्त करके बैकुंठ को जाता है। जो मनुष्यों के लिए भी दुर्लभ है।
यह एकादशी करने के लिए दशमी के दिन व्रत का आरंभ करके काँसे के पात्र में जौं आदि का भोजन करें तथा नमक न खावें। भूमि पर सोए, और ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें। एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में शौच आदि से निवृत्त होकर दन्तधावन करें और जल के बारह कुल्ले करके शुद्ध हो जाए।हे मुनिवर ! पूर्वकाल में त्रेया युग में हैहय नामक राजा के वंश में कृतवीर्य नाम का राजा महिष्मती पुरी में राज्य करता था।
उस राजा की एक हजार परम प्रिय स्त्रियाँ थीं, परंतु उनमें से किसी को भी पुत्र नहीं था, जो उनके राज्य भार को संभाल सकें। देवता, पितृ, सिद्ध तथा अनेक चिकित्सकों आदि से राजा ने पुत्र प्राप्ति के लिए काफी प्रयत्न किए लेकिन सब असफल रहे। एक दिन राजा को वन में तपस्या के लिए गये थे उनकी परम प्रिय रानी इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए राजा हरिश्चंद्र की पद्मिनी नाम वाली कन्या राजा के साथ वन जाने को तैयार हो गई। दोनों ने अपने अंग के सब सुंदर वस्त्र और आभूषणों का त्याग कर वल्कल वस्त्र धारण कर गन्धमादन पर्वत पर गए।राजा ने उस पर्वत पर दस हजार वर्ष तक तप किया परंतु फिर भी पुत्र प्राप्ति नहीं हुई। तब पतिव्रता रानी कमलनयनी पद्मिनी से अनुसूया ने कहा- बारह मास से अधिक महत्वपूर्ण अधिक मास होता है जो बत्तीस मास पश्चात आता है। उसमें द्वादशीयुक्त पद्मिनी शुक्ल पक्ष की एकादशी का जागरण समेत व्रत करने से तुम्हारी सारी मनोकामना पूर्ण होगी। इस व्रत करने से पुत्र देने वाले भगवान तुम पर प्रसन्न होकर तुम्हें शीघ्र ही पुत्र देंगे।
रानी पद्मिनी ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से एकादशी का व्रत किया। वह एकादशी को निराहार रहकर रात्रि जागरण करती। इस व्रत से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। इसी के प्रभाव से पद्मिनी के घर कार्तिवीर्य उत्पन्न हुए। जो बलवान थे और उनके समान तीनों लोकों में कोई बलवान नहीं था। तीनों लोकों में भगवान के सिवा उनको जीतने का सामर्थ्य किसी में नहीं था।
सो हे राजन ! जिन मनुष्यों ने अधिक मास शुक्ल पक्ष एकादशी का व्रत किया है, जो संपूर्ण कथा को पढ़ते या सुनते हैं, वे भी यश के भागी होकर विष्णु लोक को प्राप्त होते है।



















